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उगे न जहाँ घृणा की फसलें मन-मन स्नेह सिंधु लहराएँ ऐसा हिंदुस्तान बनाएँ जहाँ तृप्त आयत कुरान की हँस कर वेद मंत्र दुहराएँ आसन पर बैठा गिरिजाघर गुरुवाणी के सबद सुनाएँ 'धम्मं शरणं गच्छामि' से गली-गली गुंजित हो जाएँ ऐसा हिंदुस्तान बनाएँ वन में जहाँ वसंत विचरता, आम्रकुंज में हँसती होली हर आँगन में दीवाली हो, चौराहों पर हँसी ठिठोली दर्द अवांछित अभ्यागत हो, निष्कासित हों सब पीड़ाएँ ऐसा हिंदुस्तान बनाएँ रक्षित हों राधायें अपने कान्हा के सशक्त हाथों में दृष्टि दशानन उठे सिया पर प्रलंयकर जागे माथों में अभिनंदित साधना उमा की पूजित हों घर-घर ललनायें ऐसा हिंदुस्तान बनाएँ आँगन-आँगन ठुमक-ठुमक कर नाचे ताली बजा कन्हैया चाँदी-सी चमके यमुना रज रचे रास हो ताता थैया पनघट पर हँसती गोपी के गालों पर गड्ढे पड़ जाएँ ऐसा हिंदुस्तान बनाएँ किसी आँख में आँसू आए सबका मन गीला हो जाए अगर पड़ोसी भूखा हो तो मुझसे भोजन किया न जाए ईद, दीवाली, बैसाखी पर सब मिल-जुल कर मंगल गाएँ ऐसा हिंदुस्तान बनाएँ हर विंध्याचल झुककर छोटी चट्टानों को गले लगाए छोटी से छोटी सरिता को सागर की छाती दुलराए हर घर नंदनवन हो जाए हँसे...

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